कार्यक्रम
आचार्य द्विवेदी का साहित्य शोध की थाती: डॉ. त्रिपाठी
डॉ. चंदन तिवारी को मिला प्रथम ‘आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी शोध सम्मान’
नई दिल्ली। सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने अपने गुरु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को याद करते हुए कहा, “पंडित जी का पूरा साहित्य और आलोचना शोध पर आधारित है। वे सदैव अपने छात्रों को शोध की गहराई में उतरने के लिए प्रेरित करते थे। उनका मानना था कि विषय में जितना डूबोगे, उतने ही मोती पाओगे।उन्होंने कहा कि आज पंडित जी इस बात से बेहद प्रसन्न होते कि उनके नाम पर एक ऐसे सम्मान की शुरुआत हुई है जो पूर्णतः शोध को समर्पित है।
डॉ त्रिपाठी साहित्य अकादमी सभागार में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा आयोजित प्रथम आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी शोध सम्मान समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर राजकीय महाविद्यालय सलूंबर, राजस्थान के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. चंदन तिवारी के शोध प्रबंध ‘आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का भाषा चिंतन’ को पहले आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी शोध सम्मान से सम्मानित किया गया। डॉ. तिवारी को सम्मान स्वरूप स्मृति चिन्ह, सर्टिफिकेट, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का साहित्य और 21 हजार रुपए की नगद धनराशि प्रदान की गई। यह धनराशि सुरेंद्र शर्मा जी ने अपनी तरफ से डॉ चंदन तिवारी को दी। इसके अतिरिक्त राजकमल प्रकाशन द्वारा उनके शोध प्रबंध पर आधारित पुस्तक का विमोचन भी किया गया।
समारोह में साहित्यकार एवं प्रसिद्ध हास्य कवि पद्मश्री सुरेंद्र शर्मा, दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिणी परिसर के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. अनिल राय, जामिया मिलिया इस्लामिया के प्रो. नीरज कुमार, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रो. वेद प्रकाश, राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी और आचार्य सहित साहित्य और अकादमिक जगत की कई प्रमुख हस्तियां उपस्थित रहीं।
हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट की अध्यक्ष डा. अपर्णा द्विवेदी ने शोध सम्मान शुरू किए जाने के विषय पर विस्तार से चर्चा की और ट्रस्ट के अन्य गतिविधियों पर प्रकाश डाला। प्रसिद्ध हास्य कवि सुरेंद्र शर्मा ने अपनी विशिष्ट शैली में चुटकी लेते हुए कहा, “अनपढ़ लोग कविता लिखते हैं और पढ़ने-लिखने वाले उन पर शोध करते हैं। कवि पसीने पर कविता लिखता है, जिसे पसीना बहाने वाला समझ नहीं पाता, लेकिन हम जैसे लोगों को उसे समझने के लिए पसीना बहाना पड़ता है।”
मंच संचालन वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार अविनाश चंद्र ने किया जबकि ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष रत्नेश मिश्र ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापन किया।
पहला आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी शोध सम्मान डॉ चंदन तिवारी को
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट ने की नाम की घोषणा
नई दिल्ली। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट ने प्रथम आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी शोध सम्मान डॉ चंदन तिवारी को देने की घोषणा की है। ट्रस्ट की अध्यक्ष डॉ अपर्णा द्विवेदी ने बताया कि प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आचार्य जी के प्रिय शिष्य डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी की अध्यक्षता वाले छह सदस्यीय निर्णायक मंडल ने डॉ चंदन तिवारी के शोध प्रबंध ‘डॉ तिवारी आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का भाषा चिंतन’ को शोध सम्मान के लिए चयनित किया है। दिल्ली में मार्च माह के पहले पखवाड़े में आयोजित होने वाले एक सम्मान समारोह में डॉ तिवारी को यह सम्मान प्रदान किया जाएगा।
आचार्य हजारी प्रसाद मेमोरियल ट्रस्ट की अध्यक्ष डॉ अपर्णा द्विवेदी ने बृहस्पतिवार को शोध सम्मान के लिए डॉ चंदन तिवारी के नाम की घोषणा के उपरांत बताया कि उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के मूल निवासी डॉ चंदन तिवारी ने दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय से वर्ष 2022 में ‘आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी भाषा चिंतन’ विषय पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की थी। वह वर्तमान में राजस्थान के सलूंबर जिले इसके राजकीय महाविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर (गेस्ट फैकेल्टी) के रूप में कार्यरत हैं ।
सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी की अध्यक्षता वाले 6 सदस्यीय निर्णायक मंडल में शामिल दिल्ली विश्वविद्यालय दक्षिणी परिसर के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो अनिल राय, जामिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर नीरज कुमार, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर वेद प्रकाश, राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी और ट्रस्ट की अध्यक्ष डॉ अपर्णा द्विवेदी ने सर्वसम्मति से डॉ चंदन तिवारी के शोध प्रबंध को सम्मान के लिए चयनित किया है। मार्च माह में होने वाले सम्मान समारोह में डॉ चंदन तिवारी को प्रथम आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी शोध सम्मान के तहत एक पदक, प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया जाएगा। राजकमल प्रकाशन चयनित शोध प्रबंध को एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित करेगा जिसका विमोचन भी सम्मान समारोह में किया जाएगा।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की 119वीं जयंती के उपलक्ष्य में ‘अशोक के फूल’ व्याख्यानमाला का हुआ आयोजन
स्मारिका ’पुनर्नवा’ और ‘आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदीः विचारकोश’ पुस्तक का हुआ लोकार्पण
नई दिल्ली। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने हिंदी साहित्य के अनन्य लेखक और साहित्यकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को सांस्कृतिक चेतना का अग्रदूत बताया है। उन्होंने कहा कि आचार्य जी का साहित्य आम जनजीवन के समस्त पहलुओं का खूबसूरती से प्रतिनिधित्व करता है और उन्होंने साहित्य को संपूर्ण मानवजाति को सौंदर्य प्रदान करने का माध्यम बनाया।
आचार्य द्विवेदी जी की 119वीं जयंती के मौके पर साहित्य अकादमी के सभागार में शनिवार को आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा शनिवार को आचार्य द्विवेदी के प्रसिद्ध निबंध ‘अशोक के फूल’ विषय पर आयोजित व्याख्यानमाला में हरिवंश ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में उक्त बातें कहीं। इस कार्यक्रम में प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी, रांची विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ विंध्यवासिनी नंदन पाण्डेय और दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेज आप वोकेशनल स्टडीज के प्रोफेसर विनय ‘विश्वास’ ने आचार्य जी के व्यक्तित्व व कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।
इस अवसर पर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित स्मारिका ‘पुनर्नवा’का विमोचन किया गया। साथ ही डॉ विंध्यवासिनी पाण्डेय द्वारा लिखित पुस्तक ‘आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी : विचार कोश’ का भी लोकार्पण किया गया। ट्रस्ट की अध्यक्ष डॉ अपर्णा द्विवेदी ने ट्रस्ट की कार्ययोजनाओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी। आचार्य द्विवेदी जी के परनाती अभय पाण्डेय ने अतिथियों का स्वागत किया।
संबोधन में हरिवंश ने आज के आधुनिक जीवन की भौतिक चुनौतियों से निपटने के लिए आचार्य द्विवेदी जैसे साहित्यकारों के कार्यों को संज्ञान में रखने को आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि जिन आंखों ने आचार्य जी को साक्षात देखा होगा, वे अच्छी तरह से जानते हैं कि वे कभी न बुझने वाली लौ थे। वे बड़े साहित्यकार थे और उससे भी बड़े एक सांस्कृतिक चेतना के अग्रदूत थे।
आचार्य द्विवेदी के शिष्य और वरिष्ठ साहित्यकार डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी ने आचार्य जी के जीवन के अनछुए पहलुओं से श्रोताओं को स्मृतिबोध कराया। उन्होंने आचार्यजी के साथ बिताये गये समय को अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ काल बताते हुए गुरु-शिष्य परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण बताया। पउन्होंने आचार्यजी की साहित्य शैली की विशिष्टता से परिचय कराते हुए ‘अशोक के फूल’ निबंध के विभिन्न पहलुओं से अवगत कराया।
डा. विंध्यवासिनी पाण्डेय ने अशोक के फूल की विवेचना परंपरा और आधुनिकता के रूप में की । दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेज ऑफ़ वोकेशनल स्टडीज के प्रोफेसर डा. विनय विश्वास ने कहा कि अशोक के फूल को जीवन दर्शन से जोड़ते हुए सौंदर्य को सहजता का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि सुंदरता जब सहज होती है तभी वास्तविक होती है और इसके लिए सामंजस्यता का होना आवश्यक है। मंच संचालन वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक नीति के विशेषज्ञ अविनाश चंद्र ने किया।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी शोध सम्मान की वेबसाइट का लोकार्पण एवं स्मृति चिन्ह का किया अनावरण
प्रसिद्ध हास्य कवि सुरेंद्र शर्मा ने सम्मान के तहत प्रति वर्ष नकद राशि देने की घोषणा की
नई दिल्ली। प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्य डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय प्राचीन परंपरा आधुनिकता से कैसे जुड़ती है, यह परंपरा कितनी बड़ी है और परंपरा सार्थक कैसे होती है इसके सूत्र आचार्य द्विवेदी अपने निबंधों व साहित्य में देते हैं।
डॉ त्रिपाठी आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट की स्थापना की चौथी डॉ वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर बुधवार को साहित्य अकादमी के सभागार में आयोजित एक समारोह में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी शोध सम्मान वेबसाइट का लोकार्पण करने के बाद समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर पूर्व कांग्रेस महासचिव हिंदी जनार्दन द्विवेदी, प्रसिद्ध हास्य कवि पद्मश्री सुरेंद्र शर्मा, दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिणी परिसर के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो अनिल राय, जामिया मिलिया इस्लामिया के मानविकी और भाषा विभाग के प्रोफेसर नीरज कुमार अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर वेद प्रकाश समेत बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी उपस्थित थे। इस अवसर पर स्मृति चिन्ह का भी अनावरण किया गया।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट की अध्यक्ष डॉ अपर्णा द्विवेदी ने बताया कि आचार्य जी के रचनाकर्म पर तमाम विश्वविद्यालयों में लंबे समय से शोध कार्य चल रहे हैं। ट्रस्ट ने आचार्य जी के लेखन पर शोध करने वालों को प्रोत्साहित और सम्मानित करने के लिए एक व्यवस्था बनाने का संकल्प लिया है। शोध सम्मान की समग्र जानकारी के लिए एक खास वेबसाइट तैयार की गई है। इस सम्मान का नाम “आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी शोध सम्मान” है। इस सम्मान के लिए पात्रता क्या है या कैसे आवेदन करें यह समूची जानकारी वेबसाइट https://hpdwiveditrust.in/
जनार्दन द्विवेदी ने आचार्य जी के लेखन पर चर्चा करते हुए कहा कि जब हम चलते है आगे पैर बढ़ते है तो वह आधुनिकता है लेकिन जो हमारा पैर जमीन पर रखा रहता है वह परंपरा है। अगर हम दोनों पैर जमीन पर रखे रहेंगे तो जड़ हो जाएंगे। अगर हम दोनों पैर उठा लेंगे तो मुंह के बल गिर पड़ेंगे। तो हमे जड़ता और उद्दंडता को हटाकर बढ़ना है।
इस अवसर पर सुरेंद्र शर्मा ने शोध सम्मान के तहत नकद राशि प्रतिवर्ष देने की घोषणा की। प्रो अनिल राय ने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी का नया पाठ्यक्रम तैयार किया जा रहा है इसमें आचार्य द्विवेदी के और अधिक रचना कर्म को शामिल किया जा रहा है।
प्रो नीरज कुमार ने कहा कि कि वे जामिया मिलिया इस्लामिया के हिंदी विभाग में
आचार्य जी के रचनाकर्म को लेकर सृजन पीठ के गठन का प्रयास करेंगे। प्रो वेद प्रकाश ने भी अपने विचार रखे।
आचार्य ‘हजारी प्रसाद द्विवेदी शोध सम्मान’ जल्दी ही शुरु होगा
नई दिल्ली । प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी का मानना है कि कबीर की स्थापना तभी हुई जब हिंदी साहित्य की भूमिका लिखी गई, मध्यकालीन धर्म-साधना, नाथ संप्रदाय और कबीर जैसी पुस्तक लिखी गई। पूरा भक्तिकालीन साहित्य भी कबीर द्वारा लिखे गए प्रतिमानों के आधार पर देखा गया और समझ गया। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर को अपने नजरिए से देखा समझा और उन पर किताब लिखी।
डॉ त्रिपाठी ने आचार्य द्विवेदी की 118वीं जयंती के अवसर पर साहित्य अकादमी के सभागार आयोजित व्याख्यान माला में उक्त बातें कहीं। व्याख्यान का विषय ‘हजारी प्रसाद द्विवेदी के कबीर’ था। इसका आयोजन आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट ने एनएचपीसी लिमिटेड और उत्तर प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग के सहयोग से किया था । इस अवसर पर ट्रस्ट की स्मारिका ‘पुनर्नवा’ का लोकार्पण किया गया। साथ ही डॉ नित्यानंद तिवारी द्वारा आचार्य जी पर लिखी गई पुस्तक ‘अतीत को फिर से आधुनिक कहने का विवेक’ विमोचन भी किया गया।डॉ तिवारी ने यह पुस्तक डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी को समर्पित की है।
ट्रस्ट की अध्यक्ष डॉ अपर्णा द्विवेदी ने ‘आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी शोध सम्मान’ नाम से शोधार्थियों के लिए पुरस्कार शुरू करने की घोषणा की। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज में प्रोफेसर रामेश्वर राय, दिल्ली विश्वविद्यालय दक्षिणी परिसर के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो अनिल राय, प्रसिद्ध व्यंग्यकार पद्मश्री सुरेंद्र शर्मा ने भी अपने विचार रखें। कार्यक्रम के अंत में ‘सुर मल्हार’ के कलाकारों ने कबीर के भजनों का गायन किया।
प्रथम वक्ता प्रो. रामेश्वर राय ने कहा कि द्विवेदी जी कबीर को कवि मानने से हिचकते हैं। उन्होंने कहा कि डीयू में अब भी यह सवाल पूछा जा रहा है कि कबीर कवि थे या समाज सुधारक थे? उन्होंने सवाल किया कि क्या एक कवि समाज सुधारक नहीं हो सकता या एक समाज सुधारक कवि नहीं हो सकता।
प्रो. अनिल राय ने कहा कि कविता के माध्यम से किसी का रूप गढ़ना आसान होता है, लेकिन आलोचना के माध्यम से ऐसा कर पाना मुश्किल होता है। द्विवेदी जी ने कबीर का रूप गढ़ा है।
उन्होंने कबीर के कवित्व को पहचाना है। कबीर सहज के रचनाकार थे। कबीर कवि भी थे और भक्त भी थे। सुरेन्द्र शर्मा ने कहा कि कविता का न कोई धर्म होता है और न कोई विचारधारा।
पर्यावरणीय स्थिरता को बनाए रखने में इएसजी की भूमिका
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट के पर्यावरणीय पहल कुटज ने पर्यावरण दिवस के मौके पर एक वेबिनार का आयोजन किया । वेबिनार का विषय था पर्यावरणीय स्थिरता को बनाए रखने में इएसजी की भूमिका।
इस वेबिनार में कॉरपोरेट जगत के लोगों ने हिस्सा लिया। वक्ताओं में डॉ एस एम जगदीश, प्रबंध निदेशक, जीरो डिफेक्ट, पीयूश अहूजा, सीइओ, लीडरशिप आर अस और फैसिलिटेटिंग एक्सीलेंस की निदेशक नूपुर डी पाडेय थी।
नूपुर ने कहा कि पर्यावरण, सामाजिक और शासन (ESG) की अवधारणा ने व्यापारिक दुनिया में एक नई क्रांति की शुरुआत की है। ESG का मतलब है पर्यावरणीय स्थिरता (Environmental Sustainability), सामाजिक जिम्मेदारी (Social Responsibility), और शासन (Governance)। यह तीनों पहलू एक साथ मिलकर कंपनियों को न केवल आर्थिक लाभ की ओर ध्यान देने के लिए प्रेरित करते हैं, बल्कि समाज और पर्यावरण के प्रति भी उत्तरदायी बनाते हैं।
पर्यावरणीय स्थिरता के लिए ESG का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके अंतर्गत आने वाले मानदंडों में कंपनियों को प्रकृति के प्रति जिम्मेदार बनाना, ऊर्जा की बचत, कचरा प्रबंधन, और स्थायी संसाधनों का उपयोग शामिल है। इससे कंपनियां पर्यावरणीय जोखिमों को कम करने और दीर्घकालिक स्थिरता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित होती हैं।
वहीं डॉ जगदीश का मानना था कि सामाजिक जिम्मेदारी के तहत, ESG कंपनियों को अपने कर्मचारियों, ग्राहकों, और समुदायों के साथ नैतिक और समानता पर आधारित संबंध बनाने के लिए प्रेरित करता है। इससे सामाजिक समरसता और समाज के प्रति सकारात्मक योगदान को बढ़ावा मिलता है। शासन के पहलू में, ESG नैतिक शासन प्रथाओं, पारदर्शिता, और उच्च मानकों के अनुपालन को महत्व देता है। इससे कंपनियों में भ्रष्टाचार कम होता है और निवेशकों के लिए विश्वास का माहौल बनता है।
पीयूश आहूजा ने ईएसजी और मानव संसाधन पर बात की। उनका मानना था कि ESG (पर्यावरण, सामाजिक और शासन) और मानव संसाधन प्रबंधन का संयोजन एक संगठन के सतत विकास के लिए महत्वपूर्ण है। ESG मानकों का पालन करते हुए, HR विभाग नैतिक भर्ती प्रक्रियाओं, कर्मचारी कल्याण और विकास, और विविधता एवं समावेशिता को बढ़ावा देता है। इससे कर्मचारियों में उच्च प्रेरणा और संतुष्टि का स्तर बनता है, जो कि संगठन की समग्र सफलता में योगदान देता है। साथ ही, ESG उन्मुख HR प्रथाएं पर्यावरणीय जिम्मेदारी को सुनिश्चित करती हैं और सामाजिक उत्तरदायित्व को प्रोत्साहित करती हैं।
कुटज ट्रस्ट के पर्यायवरणीय पहल है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के पर्यावरण बोध पर उनके विचार कुटज की प्रेरणा है। इसका उद्देश्य पर्यावरणीय स्थिरता के प्रति लोगों की जागरुकता बढ़ाना है।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट की तीसरी वर्षगांठ पर गोष्ठी एवं काव्य पाठ आयोजित
नई दिल्ली । प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी कहते थे 30-40 किताबें पढकर तो कोई भी विद्वान हो जाएगा, पर विद्वान होने से क्या होता है। मनुष्य होना बड़ी बात । उन्होंने यह बात शनिवार को साहित्य अकादमी सभागार में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट की तीसरी वषर्गांठ पर आयोजित गोष्ठी को संबोधित करते हुए कही। संगोष्ठी का विषय ‘आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी: साहित्य और भाषा के फक्कड़ साधक‘ था। गोष्टी के मुख्य वक्ता प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ ज्योतिष जोशी थे जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी ने की। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार प्रभात शुंगलू एवं रत्नेश मिश्र ने आचार्य जी की कविताओं का पाठ भी किया। इस मौके पर वरिष्ठ नेता जर्नादन द्विवेदी, हास्य कवि सुरन्द्र शर्मा समेत ट्रस्ट की अध्यक्ष डा. अपर्णा द्विवेदी, महासचिव नुपूर द्विवेदी के अलावा कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्यकार, पत्रकार आदि मौजूद थे।
इस मौके पर श्री त्रिपाठी ने अपने गुरु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के साथ के अपने अनुभवों का साझा करते हुए कहा कि आचार्य जी विद्ववता की बहुत इज्जत करते थे। वह पढते बहुत थे और कभी-कभी तो 16-16 घंटे तक पढाई करते थे। उन्होंने आचार्य जी की कालीदास के सौंदर्यशास्त्र पर चर्चा करते हुए कहा कि वह पहले से प्रतिष्ठित सौंदर्य को प्रतिष्ठित नहीं कर रहे थे बल्कि वह उसे पुर्नस्थापित करत रहे थे। आचार्य जी ने सिर्फ सौंदर्य को ही नहीं बल्कि दोनों पक्षों को लिखा है, इसलिए वह हजारी प्रसाद द्विवेदी है।
डा. ज्योतिष जोशी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हिन्दी साहित्य के दो अन्यतम शिखर हैं, जिनको स्पर्श किए बिना हमारा समस्त साहित्य ज्ञान अधूरा है। उन्होंने दोनों साहित्यकारों का स्मरण करते हुए कहा कि आचार्य शुक्ल जहां मर्यादा पुरुषोत्तम हैं तो वहीं आचार्य द्विवेदी लीला पुरुषोत्तम हैं। उन्होंने कहा कि आचार्य जी लिखते हैं कि जो इतिहास को स्वीकार न करे वह आधुनिक नहीं और जो चेतना को न माने वह इतिहास नहीं।
इससे सबसे पहले ट्रस्ट की अध्यक्ष डॉ अपर्णा द्विवेदी ने अतिथियों का स्वागत पौधा दे कर किया, एवं मंच का संचालन भी किया। ट्रस्ट की महासचिव नूपुर द्विवेदी पांडे ने ट्रस्ट की साल भर की गतिविधियों का ब्यौरा प्रस्तुत किया। साथ ही उन्होंने ट्रस्ट की अन्य गतिविधियों के बारे में जानकारी दी।
आचार्य जी की 117 वीं जयंती पर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट ने आयोजित की संगोष्ठी
नई दिल्ली (एसएनबी)। वरिष्ठ साहित्यकार व कवि अशोक वाजपेयी ने कहा कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की रचनाएं दशकों पहले जितनी प्रासंगिक थी वे आज और अधिक प्रासंगिक हो गई हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि आचार्य द्विवेदी किस स्तर के भविष्यदृष्टा थे।
अशोक वाजपेयी शनिवार को आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की 117वीं जयंती पर साहित्य अकादमी के सभागार में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा आयोजित संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। इस संगोष्ठी का विषय आचार्य द्विवेदी का प्रसिद्ध निबंध “मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है” था।
संगोष्ठी में प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो सुधीर चंद्र ने भी वक्ता के रूप में शिरकत की जबकि अध्यक्षता जाने-माने साहित्यकार एवं आचार्य द्विवेदी के शिष्य डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी ने की। आरंभ में अशोक वाजपेयी, प्रो सुधीर चंद्र, डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी, प्रसिद्ध व्यंग्यकार पद्मश्री सुरेंद्र शर्मा, राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी, ट्रस्ट की अध्यक्ष डॉ अपर्णा द्विवेदी एवं महासचिव नूपुर द्विवेदी पांडे ने ट्रस्ट द्वारा लगातार दूसरे वर्ष प्रकाशित स्मारिका “पुनर्नवा” का संयुक्त रूप से लोकार्पण किया।
व्याख्यान में अशोक वाजपेयी ने कहा कि हिन्दी पर जो सबसे बड़ा संकट हैं वह झूठ का है। हिन्दी में जितनी अभ्रद्रता होती है उतनी किसी अन्य भाषा में नहीं है। ऐसे में साहित्यकारों का दायित्व है कि वह सच और झूठ से पाठकों को बताएं। उन्होंने कहा कि संवेदनशीलता और साझी मनुष्यता साहित्य से ही संभव है।
प्रो. सुधीर चंद्र ने कहा कि आचार्य द्विवेदी जैसा विद्वान हिन्दी में ही नहीं किसी अन्य भाषा में भी कोई नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि आचार्य जी कहते है कि जिस साहित्य का उद्देश्य मनुष्यता नहीं है वह कल्पना विलासिता है। आचार्य जी का 1948 में लिखा हुआ आज और भयावहता के साथ हमारे सामने मौजूद है।
संगोष्ठी के अध्यक्ष डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी ने पंडित जी (द्विवेदी जी) के सौंदर्य बोध की चर्चा की और उनकी रचना चारु चंदल्रेख के अंश का उल्लेख करते हुए कहा कि जब ज्ञान आएगा तो फिर वह सीक्रेट नहीं रहेगा। जैसे एटम बम बन जाएगा तो फिर वह सीक्रेट नहीं रह जाएगा। उन्होंने मौजूदा समय में एआई (आर्टिफिशिटल इंटेलिजेस) पर चर्चा करते हुए कहा कि यह पत्रकार, लेखक, अध्यापक को खा जाएगा। इससे लाखों लोग बेकार हो जाएगें, लेकिन यह सब कुछ आज के विज्ञान के लिए एक अंक भर होगा। आचार्य द्विवेदी के पारिवारिक सदस्य सुनील द्विवेदी ने आचार्य जी के साथ बिताए पलों को याद करते हुए उनकी खुलकर हंसने की प्रशंसा की । ट्रस्ट के अध्यक्ष डॉ अपर्णा द्विवेदी ने ट्रस्ट द्वारा किए जा रहे कार्यों व अन्य गतिविधियों की जानकारी दी और अंत में सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन किया।
अंडरस्टैंडिंग टीन, ए पैरेंटल जर्नी ‘ का लोकार्पण
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट एवं ‘फेसिलिटेटिंग एक्सीलेंस ‘के संयुक्त कार्यक्रम में ‘अंडरस्टैंडिंग टीन, ए पैरेंटल जर्नी ‘ का लोकार्पण
नई दिल्ली । अपने बच्चों की अच्छी परवरिश कैसे की जाए , पहले कभी यह बहस का मुद्दा नहीं था लेकिन बदलते सामाजिक परिवेश में पेरेंटिंग अब एक बड़ी चुनौती है। इमोशनल इंटेलिजेंस कोच और स्ट्रेटेजिक मैनेजमेंट कंसल्टेंट नूपुर द्विवेदी पाण्डेय ने इसी विषय पर किताब लिखी है जिसका शीर्षक है ‘अंडरस्टैंडिंग टीन, ए पैरेंटल जर्नी’।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट और फेसिलिटेटिंग एक्सीलेंस नामक संस्था द्वारा आयोजित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित ‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम में पुस्तक ‘अंडरस्टैंडिंग टीन, ए पैरेंटल जर्नी’ का विमोचन किया गया। इस मौके पर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट की अध्यक्ष डॉ अपर्णा द्विवेदी, कई वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं अभिभावक मौजूद थे। इस कार्यक्रम में मेजबान (होस्ट) की भूमिका वरिष्ठ पत्रकार अदिति प्रसाद ने निभाई। अदिति ने अपनी प्रारंभिक टिप्पणी ने कहा कि बच्चों की परवरिश कैसे की जाए, जैसे विषय पर इतना गंभीर चिंतन एवं उस पर पुस्तक लिखना अपने आप में अद्वितीय है। अदिति के एक प्रश्न के जवाब में पुस्तक की लेखक नूपुर द्विवेदी पाण्डेय ने कहा कि एक ऐसा स्थान बनाना महत्वपूर्ण है जहां किशोर अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सके और अपने माता-पिता के साथ खुले। साथ ही ईमानदार होने में सहज महसूस करें।
नूपुर ने कहा कि पहले संयुक्त परिवार हुआ करते थे। बच्चे की परवरिश में पूरे परिवार की भूमिका होती थी। माता पिता की भूमिका आमतौर पर उसकी जरूरतों को पूरा करने तक ही सीमित होती थी। लेकिन अब एकल परिवार हैं। ऐसे में बच्चे की परवरिश की सभी जिम्मेदारियां माता-पिता को ही निभानी होती हैं। बदले हुए सामाजिक परिवेश में बच्चों की परवरिश कैसे की जाए, क्या-क्या एहतियात बरते जाएं, अभिभावक क्या करें, क्या न करें जैसे सवाल आज के समय में बेहद प्रासंगिक है।
पालन-पोषण की शैली के बारे में एक पेरेंट के सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि किसी भी दो बच्चों को एक ही तरह की परवरिश की आवश्यकता नहीं होती है और यही बात दो पीढ़ियों के लिए भी लागू होती है। हमारे माता-पिता ने हमें पालने में जो सामना किया, उससे इस पीढ़ी के पास अलग-अलग चुनौतियाँ हैं।
कार्यक्रम में किताब की लेखक ने इस बात पर जोर दिया कि इससे पहले कि हम माता-पिता के रूप में सीखें और उसे अपनाएं, हमें अपने ‘माइंड सेट’ में बदलाव लाना होगा । तभी घरेलू मोर्चे पर बच्चों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करने की प्रक्रिया शुरू होगी। नूपुर ने अपनी पुस्तक में है अच्छी परवरिश को लेकर कुछ ऐसी तकनीकों का जिक्र किया है जो सामाजिक शोध पर आधारित हैं। इतना ही नहीं उन्होंने इन तकनीकों का प्रयोग भी किया है।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट एवं हंसराज कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय ने आयोजित की “हिंदी रोजगार की भाषा” विषय पर परिचर्चा
नई दिल्ली । वरिष्ठ पत्रकार एवं भाषा कर्मी राहुल देव ने कहा कि हिंदी हमारी मातृभाषा नहीं बल्कि प्रथम भाषा है । यह हमारे चिंतन की भाषा पढ़ाई लिखाई की भाषा हो सकती है। हर भारतीय भाषाओं के लिए यह बात उतनी ही प्रासंगिक है जितने की हिंदी के लिए। अंग्रेजी कोई समस्या नहीं है हमें हमारा भविष्य बहुभाषिकता ही है। हमें बहुत राशि होना पड़ेगा हम मिली जुली भाषा के साथ ही बहुभाषी परिवेश में जी रहे हैं ।अंग्रेजी एक समस्या है इससे हमें बाहर निकलना होगा।
दिल्ली विश्वविद्यालय के उत्तरी परिसर में स्थित हंसराज कॉलेज के पद्मभूषण ज्ञान प्रकाश संगोष्ठी कक्ष में बुधवार को “हिंदी रोजगार की भाषा” विषय पर आयोजित संगोष्ठी को राहुल देव मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। यह परिचर्चा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट और हंसराज कॉलेज के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई थी। इस पर चर्चा में पत्रकार एवं भाषाकर्मी राहुल देव के अलावा कालेज की प्राचार्य प्रोफेसर रमा, टीवी पत्रकार संगीता तिवारी एवं वाणी प्रकाशन की प्रबंध निदेशक अदिति माहेश्वरी गोयल मौजूद थीं। कार्यक्रम के आरंभ में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट की अध्यक्ष डॉ अपर्णा द्विवेदी ने अतिथियों का स्वागत किया और ट्रस्ट की प्राथमिकताओं के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि यह ट्रस्ट शिक्षा, भाषा, साहित्य, पर्यावरण के क्षेत्र में प्रमुखता से कार्य कर रहा है और निकट भविष्य में इसकी और भी कई योजनाएं हैं।
पत्रकार राहुल देव ने हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में रोजगार की संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जनसंपर्क, विज्ञापन, संवाद, लेखन, फिल्में ये ऐसे क्षेत्र हैं जहां बदलते वक्त के साथ रोजगार की संभावनाएं खूब बड़ी है और हिंदी और भारतीय भाषाओं का भविष्य उज्जवल है। लेकिन हमें बहुभाषी होना पड़ेगा। हमें हमें किसी एक भाषा पर अधिकार प्राप्त करना होगा अन्यथा “हिंग्लिश” से काम चलने वाला नहीं है। अच्छे चिंतन के लिए एक भाषा अच्छी तरह आनी चाहिए।
पत्रकार टीवी पत्रकार संगीता तिवारी ने कहा कि हिंदी रोजगार की भाषा है हालांकि इसकी अपनी चुनौतियां भी है 25 साल पहले टीवी न्यूज़ 20 मिनट 30 मिनट की होती थी अब बढ़कर 24 घंटे के चैनलों की भरमार है । वर्तमान में डिजिटल ने हिंदी वालों के लिए रोजगार और अधिक अवसर पैदा किए हैं। हिंदी आज बाजार की जरूरत है और हमें उसी हिसाब से अपने आप को तैयार करना होगा।
वाणी प्रकाशन की प्रबंध निदेशक अदिति माहेश्वरी गोयल ने कहा कि अगर बाजार में किसी को कुछ बेचना देखना है तो उसे हिंदी में आना होगा। हिंदी भाषा बदल रही है, भाषा के नायक बदल रहे हैं। इसलिए हिंदी का भविष्य उज्जवल है । रोजगार की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन हमें इस भाषा पर अधिकार तो करना पड़ेगा तभी यह सब कुछ संभव है ।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की 116 वीं जयंती पर स्मारिका “पुनर्नवा” का लोकार्पण
नई दिल्ली। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का व्यक्तित्व और उनका साहित्य दोनों भारतीय संस्कृति के प्रतीक हैं। मध्यकालीन साहित्य की व्याख्या करते हैं व आधुनिकता और परंपरा को समझाते हैं। अपने समय के मनुष्य को साहित्य से गठने का प्रयास करते हैं। यह सब करते हुए वे समाज के सबसे निम्न वर्ग और वर्ण के व्यक्ति, वंचित और शोषित को नहीं भूलते। यह कहना है हिंदी के वरिष्ठ आलोचक, कवि व गद्यकार डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी का।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की 116वीं जयंती के अवसर पर शनिवार को आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट और हिंदी अकादमी, दिल्ली सरकार के संयुक्त तत्वावधान में साहित्य अकादमी के सभागार में गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी मुख्य वक्ता के रूप में मौजूद थे जबकि हिंदी साहित्य के वरिष्ठ आलोचक प्रो. नित्यानंद तिवारी ने गोष्ठी की अध्यक्षता की । कार्यक्रम के आरंभ में कार्यक्रम के आरंभ में ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित स्मारिका “पुनर्नवा” का विमोचन भी किया गया। इस मौके पर पूर्व सांसद एवं प्रसिद्ध हिंदीसेवी जनार्दन द्विवेदी, विख्यात व्यंग्यकार पद्मश्री सुरेंद्र शर्मा और राजकमल प्रकाशन के प्रमुख अशोक माहेश्वरी भी मौजूद थे।
गोष्ठी के मुख्य वक्ता डॉ. त्रिपाठी ने अपने संबोधन में कहा कि आचार्य जी का प्रिय वाक्य है “सत्य प्रच्छन्न होकर निवास करता है।” प्रच्छन्न को संघर्ष करके उजागर या प्रतिष्ठित करना पड़ता है । प्रतिष्ठान भरसक उसे पीछे ही रखने का काम करता है। मानवीय संस्कृति का आधार, यही संघर्ष सामाजिकता है।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रो नित्यानंद तिवारी ने कहा कि द्विवेदी जी साहित्य बोध और आधुनिकता बोध की “समझ” में परंपरा को गहराई के आयाम में देखते हैं। परंपरा और आधुनिकता के स्वरूप को उनकी अंत: गतिशीलता के रूप में प्रस्तावित करते हैं।
परिवर्तित होते हुए कायम रहने वाली योग्यता को वे इस प्रक्रिया में पहचानते हैं। इसलिए परंपरा और आधुनिकता के बीच में एक गहरे सृजनशील संबंध को पहचान लेते हैं। आचार्य जी परंपरा और आधुनिकता को परस्पर सहयोगी भूमिका में देखने वाले आधुनिक युग के विशिष्ट आलोचक हैं। वह विज्ञान और साहित्य को विरोधी नहीं सहयोगी की भूमिका में देखते हैं। ट्रस्ट की अध्यक्ष डॉ अपर्णा द्विवेदी ने कार्यक्रम के आरंभ में ट्रस्ट के गठन के उद्देश्य के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि यह ट्रस्ट साहित्य, भाषा, शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में काम कर रहा है। ये चारों क्षेत्र आचार्य द्विवेदी जी के बहुत करीब थे।
प्रोजेक्ट “कुटज” के तहत ई वेस्ट पर जागरुकता अभियान
नई दिल्ली । विश्व पृथ्वी दिवस (22 अप्रैल) के अवसर पर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट ने अपने प्रोजेक्ट “कुटज” के ई वेस्ट (इलेक्ट्रॉनिक कचरा) के सही तरीके से रिसाइकिल के मुद्दे को उठाया। ट्रस्ट ने दिल्ली के जनकपुरी में लोगों को जागरूक करने के लिए एक ई वेस्ट इकट्ठा करने का अभियान चलाया। इस अभियान का मूल उद्देश्य लोगों को ई वेस्ट की समस्या और उसके खतरे के बारे में जानकारी देना था। इस पूरी मुहिम में श्रीराम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल रिसर्च ने ट्रस्ट की “नालेज पार्टनर” के रूप में मदद की।
श्रीराम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल रिसर्च कई वर्षों से वेस्ट मैनेजमेंट पर रिसर्च कर रहा है। इसके लिए इंस्टिट्यूट में अपने यहां अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं भी स्थापित की हुई है।आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ट्रस्ट की अध्यक्ष डॉ अपर्णा द्विवेदी ने जनकपुरी इलाके से इकट्ठा किए गए ई वेस्ट को श्रीराम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल रिसर्च के सलाहकार विजय सरदाना को सौंपा।
इस मौके पर श्री सरदाना ने बताया कि आमतौर पर लोग ई वेस्ट कबाड़ी को बेच देते हैं। और समस्या यहीं से उत्पन्न होती है क्योंकि लोगों को ई वेस्ट मैनेजमेंट सही तरीके से आता नहीं है। वो फोन आदि हर संभव मेटल निकाल कर बाकी जला देते हैं। और जला हुआ सारा सामान या तो नदी में नहीं तो जमीन में गाड़ देते हैं। उस वेस्ट में हैवी मेटल धरती और पानी दोनो को खराब करते हैं और कई तरह की बीमारियों को दावत देते हैं।
श्री सरदाना ने कहा कि उनका इंस्टिट्यूट वेस्ट मैनेजमेंट में ऐसे रिसर्च कर रहा है जिसमें ई वेस्ट से निकले सारे सामान का उपयोग किया जा सके। और इसके लिए जरूरी है कि लोगों को जागरूक किया जा सके। उन्होंने कहा कि ई वेस्ट मैनेजमेंट भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है और इसके लिए हमें यथाशीघ्र प्रभावी कदम उठाने होंगे।
ट्रस्ट की अध्यक्ष डॉ अपर्णा द्विवेदी ने बताया कि ट्रस्ट की योजना है कि आरडब्लूए के साथ मिल कर ई वेस्ट को लेकर लोगों को जागरूक किया जाए।
अपर्णा ने बताया कि हालात की गंभीरता है का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर 2020 रिपोर्ट के अनुसार, 2019 में करीब 5.36 करोड़ मीट्रिक टन ई-वेस्ट उत्पन्न हुआ था। अनुमान है कि 2030 में ये बढ़कर 7.4 करोड़ मीट्रिक टन पर पहुंच जाएगा यानी अभी से करीब दोगुना हो जाएगा। भारतीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा दिसंबर, 2020 में जारी रिपोर्ट के मुताबिक 2019-20 में भारत ने 10,14,961.2 टन ई-वेस्ट पैदा किया था लेकिन कलेक्शन केवल 10 फीसदी किया गया। समय की जरुरत है कि ई वेस्ट को सही तरीके से इकट्ठा कर उसका सही तरीके से निपटान किया जाए।
भारतीय संस्कृति में मानवीय जिजीविषा” की पहली प्रति राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भेंट
नई दिल्ली। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के चुनिंदा निबंधों के संकलन “भारतीय संस्कृति में मानवीय जिजीविषा” की पहली प्रति बुधवार को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भेंट की गई ।राष्ट्रपति भवन में बुधवार को गरिमामय संक्षिप्त कार्यक्रम में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट की अध्यक्ष एवं निबंध संकलन की संपादक डॉ अपर्णा द्विवेदी ने महामहिम राष्ट्रपति को पुस्तक की पहली प्रति भेंट की।
ट्रस्ट की अध्यक्ष डॉ अपर्णा द्विवेदी ने आचार्य जी के निबंधों के इस संकलन के बारे में बताया कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंधों में गहन अध्ययन व चिंतन, भारतीय संस्कृति,इतिहास, धर्म और दर्शन स्पष्टतः परिलक्षित होता है। आचार्य द्विवेदी के ललित निबन्धों में मनुष्य की जय यात्रा को वाणी मिलती है। वे परम्परा की रूढ़ियों को तोड़कर आधुनिकता का बोध कराते हैं। लोक और शास्त्रों का समन्वय भी उनके लेखन में देखने को मिलता है। आचार्य जी ने साहित्य, ज्ञान, अध्ययन, संस्कृतिबोध, इतिहास दृष्टि, सामाजिक बोध,भाषिक विश्लेषण आदि विषयों पर निबंध लिखे हैं। उनके लेखन शैली की खास बात है कि वे अपने निबंधों में विषय को विस्तार देते हैं। विवेचना के क्रम में अगर नए और गूढ़ विषय सामने आते हैं तो वो उन्हें सहजता से समझाते हैं। डॉ अपर्णा ने कहा कि इस पुस्तक में हमने द्विवेदी जी के कुछ खास और अनूठे निबंध लिए है। आचार्य द्विवेदी के निबन्ध मनुष्यता की अविराम यात्रा हैं। द्विवेदी जी की वैज्ञानिक सोच पचास- साठ साल बाद भी प्रासंगिक हैं। गंभीर विषयों पर वे हंसाते गुदगुदाते हुए पाठक को विचार करने पर मजबूर कर देते थे। राष्ट्रपति जी को पुस्तक की पहली प्रति भेंट किए जाने के अवसर पर नूपुर पाण्डेय ,रत्नेश मिश्र के अशोक महेश्वरी भी मौजूद थे।
“भारतीय संस्कृति में मानवीय जिजीविषा ” की संपादक डॉ अपर्णा ने बताया कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट का लक्ष्य आचार्य जी की भारतीय संस्कृति पर वैज्ञानिक दृष्टि , भारतीय साहित्य और चिंतन को जन जन तक पहुंचाना है। यह ट्रस्ट 2016 से साहित्य, भाषा, शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में काम कर रहा है। इस ट्रस्ट का उद्देश्य आचार्य जी के लेखन को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युवाओं तक पहुंचाना, डिजिटल होती हिन्दी भाषा और साहित्य में लोगों की रुचि व जागरूकता बढ़ाना, शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करना है ।
प्रधानमंत्री योजना के ‘युवा’ कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए ट्रस्ट की योजना है कि युवा लेखकों को प्रोत्साहित करने के लिए साहित्य लेखन प्रतियोगिताएं राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित की जाएं।
डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी के नाम पर पार्क का नामकरण
दक्षिण दिल्ली नगर निगम ने प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी के नाम पर एक पार्क का नामकरण किया।19 दिसंबर 2016 में पश्चिमी दिल्ली के जनकपुरी ब्लॉक सी2बी में स्थित पार्क के गेट पर डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी के नाम का शिलापट्ट लगा कर वार्ड समिति के चेयरमैन कर्मवीर शेखर और स्थानीय पार्षद रजनी ममतानी ने इस पार्क का उद्धाटन किया।
सी2बी जनकपुरी आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का प्रिय स्थान था। डीडीए के इस ब्लॉक में उनके द्वितीय पुत्र डॉ मुकुन्द द्विवेदी रहते थे। आचार्य द्विवेदी जब भी दिल्ली आते थे, यहीं पर रुकते थे। इसी कारण ये ब्लॉक में कई तरह की साहित्यिक गोष्ठियां होती थी। उनकी अंतिम यात्रा भी इसी स्थान से निकली थी।
इस पार्क के नामकरण के साथ श्री शेखर ने कहा कि वो उम्मीद करते हैं कि पार्क में लगा हुआ ये नाम आज की युवा पीढ़ी को प्रेरित करेगा। युवा पीढ़ी द्विवेदी से साहित्य से भारतीय संस्कृति और आधुनिक वैज्ञानिक सोच को अपनाएगी। इस कार्यक्रम में मौजूद वरिष्ट पत्रकार और उनकी पौत्री डॉ अपर्णा द्विवेदी ने बताया कि आचार्य द्विवेदी के नाम पर एक ट्रस्ट बनने वाला है जो कि हिन्दी भाषा, साहित्य, शिक्षा और पर्यावरण पर काम करेगा। उन्होंने बताया कि ट्रस्ट का काम तो शुरु हो गया है ।
ट्रस्ट के “पंख” प्रोजेक्ट के तहत ट्रेनिंग कार्यक्रम
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट भाषा , साहित्य, शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में काम कर रहा है। साथ ही ट्रस्ट डिजिटल हिन्दी पर भी खास जोर दे रहा है। ट्रस्ट ने डिजिटल संवाद पर कई कार्यशालाएं और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए हैं।
ग्रामीण विकास मंत्रालय (MoRD) और राष्ट्रीय ग्रामीण विकास और पंचायती राज संस्थान द्वारा आयोजित किए जाने वाले सरस मेला में देश भर के स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिला उद्यमियों को भी ट्रस्ट प्रशिक्षण देता है। इस ट्रेनिंग का उद्देश्य इस तरह की उद्यमी महिलाओं को डिजिटल माध्यमों की जानकारी देना और तकनीकी रूप से मजबूत करना है।
इसी प्रकार ट्रस्ट संवाद और सोशल मीडिया की चुनौतियों पर भी प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करता है, ताकि आने वाले समय में लोग इन चुनौतियों का सामना कर सके।